भूमंडलीकरण की संतान है एड्स..

- आनंद प्रधान

एड्स नियंत्रण का अर्थशास्त्र भारत के जनस्वास्थ्य प्राथमिकताओं को तोड़-मरोड़ रहा है
पिछले एक दशक से एचआईवी-एड्स को लेकर पूरी दुनिया में और खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में नीति-निर्माताओं में खासा हाहाकार मचा हुआ है। यह हाहाकार दिन-पर-दिन और गहराता जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एड्स एक घातक महामारी के रूप में विकासशील देशों के जनस्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। लेकिन एड्स को लेकर मचाए जा रहे हाहाकार के बीच कई सवालों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है और जनस्वास्थ्य से जुड़ी प्राथमिकताओं को तोडा-मरोड़ा जा रहा है।

आखिर एड्स आया कहां से? अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि भूमंडलीकरण और एड्स के बीच गहरा संबंध है। सच पूछिए तो एड्स, भूमंडलीकरण का एक ऐसा प्रतीक चिन्ह है जो 80 के दशक में भूमंडलीकरण के साथ-साथ दुनिया के नक्शे पर छाता चला गया। दोनों एक ही साथ फले-फूले हैं और दोनों कई मामलों में एक-दूसरे के पूरक भी हैं। दोनों को अलग करना मुश्किल है। इसलिए यह नहीं हो सकता है कि आप भूमंडलीकरण को तो गले लगाने के लिए तैयार हैं लेकिन एड्स के नाम पर आपके रोंगटे खड़े होने लगते हैं। जाहिर है, अगर आप भूमंडलीकरण का दोनों हाथ खोलकर स्वागत करने के लिए तैयार हैं तो आपको एड्स के साथ जीने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

चौंकिए मत, लेकिन अगर भूमंडलीकरण को मिथकीय समुद्र मंथन का आधुनिक रूप मान लिया जाए तो इस समुद्र मंथन से जो विष निकल रहा है, उसका एक घातक रूप एड्स भी है। दुर्भाग्य से पहले की तरह ही यह विष भी असुरों यानि तीसरी दुनिया के देशों को ही पीना पड़ रहा है। गरीब और पिछड़े मुल्कों और इलाकों में एचआईवी-एड्स एक धीमे जहर की तरह फैल रहा है। इसके सबसे ज्यादा शिकार गरीब और कमजोर वर्ग के लोग हो रहे हैं। कई अफ्रीकी देशों की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को एड्स ने तबाह कर दिया है।

भारत भी एड्स के असर से अछूता नहीं है। हालांकि देश में एड्स पीडितों की कुल संख्या, सरकारी एजेंसी नाको के मुताबिक करीब सवा लाख के आसपास है लेकिन देश के कई राज्यों खासकर तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों के अलावा उत्तर पूर्वी भारत में एड्स पीडितों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। वैसे सरकारी आकड़ों में बिहार समेत उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में एड्स पीड़ितों की संख्या लगभग नगण्य है लेकिन यह एक तथ्य है कि ये राज्य भी एड्स के संभावित शिकारों की सूची में सबसे ऊपर हैं। इसकी वजह वे आप्रवासी मजदूर हैं जो काम के सिलसिले में राज्य से बाहर मुंबई, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में जाते और कुछ महीनों के बाद वापस लौट आते हैं।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि बिहार जैसे राज्य में आप्रवासी मजदूरों की तादाद बहुत ज्यादा है। वे अपने परिवारों से दूर रहते हैं और अपने अज्ञानतापूर्ण और अराजक सेक्सुअल व्यवहार के कारण बहुत आसानी से एड्स की चपेट में आ सकते हैं। इसलिए बिहार जैसे राज्य एचआईवी-एड्स की महामारी के कगार पर बैठे हैं। बिहार जैसे राज्यों के लिए यह एक गंभीर चुनौती है। इसलिए कि आमतौर पर एड्स का संक्रमण युवाओं में सबसे ज्यादा होता है जब वे अपने जीवनकाल के सबसे उत्पादक दौर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे युवाओं में एड्स संक्रमण का खामियाजा न सिर्फ उनका परिवार और समुदाय उठाता है बल्कि उस राज्य और देश की अर्थव्यवस्था पर भी उसका बहुत घातक असर होता है क्योंकि एड्स का इलाज बहुत खर्चीला है और सर्वाधिक उत्पादक तबके के बीमारी से राष्ट्रीय विकास पर भी नकारात्मक असर होता है।

इसलिए अगर बिहार जैसे गरीब और पिछड़े राज्यों में एड्स एक महामारी की शक्ल लेता है तो उससे निपटना संभव नहीं रह जाएगा। चूंकि एड्स का इलाज बहुत महंगा है इसलिए उसकी रोकथाम पर जोर देना ही उससे निपटने का सबसे बेहतर तरीका है। एड्स रोकथाम का सबसे बेहतर उपाय सेक्सुअल व्यवहार में एकनिष्ठता और संयम रखना है क्योंकि खुद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में एड्स के 85 प्रतिशत पीडितों को यह बीमारी सेक्सुअल संक्रमण के जरिए हुई है। लेकिन विडंबना यह है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में सेक्सुअल उच्छृंखल और उद्दाम यौन भावनाओं को आधुनिकता के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है। यौन एकनिष्ठता को पिछड़ेपन और रूढ़िवादिता का पर्याय बना दिया गया है।

आश्चर्य नहीं कि पिछले एक-डेढ़ दशकों में देश में अश्लील साहित्य (पोर्न) का एक विशाल बाजार विकसित हुआ है। आज अगर दुनिया में अश्लील साहित्य का बाजार 57 अरब डॉलर तक पहुंच गया है तो भारत में भी यह बाजार प्रति वर्ष 25 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ लगभग ढाई अरब रूपये का हो चुका है। एक ओर अश्लील साहित्य का विस्तार और दूसरी ओर, मुख्यधारा के मीडिया खासकर टेलीविजन चैनलों पर जिस तरह से अश्लीलता फैलती जा रही है, उसे देखते हुए यौन एकनिष्ठता और संयम गुजरे जमाने की बात हो गई लगती है।
आज भूमंडलीकरण के दबाव में मध्यवर्गीय नैतिकता के मूल्य और मानदंड जिस तेजी से बदल रहे हैं, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि जल्दी ही यौन एकनिष्ठता नियम के बजाय अपवाद बन जाएगा।

इसके साथ ही, भूमंडलीकरण के साथ नशे के कारोबार का विस्तार भी काफी तेजी से हुआ है। रोजगार विहीन विकास के इस दौर में युवाओं के कुंठाओं और आक्रोश को नशे और नीले साहित्य के अंधकार में डुबाने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, आज देश एक जबरदस्त युवा विस्फोट से गुजर रहा है। देश की कुल आबादी का दो तिहाई हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र का है। लेकिन भूमंडलीकरण के पास नशे और पोर्न साहित्य के अलावा उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है। दोहराने की जरूरत नहीं है कि नशा और अनियंत्रित यौन संबंध एड्स के फैलाव के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है।

लेकिन भूमंडलीकरण के पास इसका कोई जवाब नहीं है क्योंकि एड्स प्रकारांतर से भूमंडलीकरण की ही संतान है। इसलिए जैसे-जैसे भूमंडलीकरण का विस्तार होगा, उसकी एड्स जैसी उसकी संताने भी बढ़ती जाएंगी। फिर सवाल उठता है कि बिल गेट्स भूमंडलीकरण के सबसे बड़े पैरोकार एड्स पर नियंत्रण के लिए इतना भागदौड़ क्यों कर रहे हैं ? इसकी सीधी सी वजह यह है कि वे इस आशंका से डरे हुए हैं कि भूमंडलीकरण का विष कहीं विकसित देशों और श्वेत दुनिया तक न पहुंच जाए। दूसरा, एड्स नियंत्रण का भी अपना एक अर्थशास्त्र है। एड्स की महंगी दवाओं से लेकर तीसरी दुनिया के देशों के जनस्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में तोड़-मरोड़ तक इस अर्थशास्त्र को सक्रिय देखा जा सकता है। आखिर भारत में एड्स से कई गुना अधिक लोग मलेरिया, कालाजार, टीबी और दूसरी संक्रामक बीमारियों के कारण असमय काल के गाल में समा रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा एड्स नियंत्रण पर खर्च हो रहा है। इसे किस तरह से न्यायोचित ठहराया जा सकता है?

साभार - तीसरा रास्ता

मैं नक्सली कवि हूं: वरवर राव


अजय प्रकाश


आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरूआत कैसे हुयी?

मैं एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखता हूं जिसने आंध्र प्रदेश के निजाम विरोधी संघर्ष में भागीदारी की आगे चलकर मेरा परिवार कांग्रेसी हो गया इसलिये मैं इस भ्रम में भी रहा कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में चल रही कांग्रसी सरकार समाजवाद की स्थापना करेगी १९६०-६२ में श्रीकाकुलम के दमन के बाद मेरा भ्रम क्रमश्: छंटता गया और नेहरू के बारे में मेरी राय १९६४ तक स्पष्ट हो गयी इसी बीच मुझे जनकवि पाणीग्रही ने बेहद प्रभावित किया उन्हीं के प्रभाव में 'सृजना' नाम की साहित्यिक पत्रिका भी निकली उसी दौरान हमने 'विरसम' का गठन किया

किस कविता के पात्र ने आपको अधिक प्रभावित किया है?

आंध्रा के निजामाबाद में एक लोमहर्षक घटना हुई थी। उस पर मैंने 'कसाई' नाम की एक कविता लिखी १९८४ में निजामाबाद के कामारेड्डा कस्बे मे बंद का आहवान किया गया थाजिसमे १९ वर्षीय अमरेंद्र रेड्डी मांस की दुकान बंद कराने पहुंचा बात उलझ गयी और कसाई ने पुलिस को फ़ोन कर दिया पुलिस ने बंद समर्थक को इतना मारा कि उसने मौके पर दम तोड दिया जांच करने गयी कमेटी से कसाई ने बयान किया था कि 'मैंने सोचा पुलिस आयेगी तो उसे पकड ले जायेगी हमें क्या पता था कि उसे गोली मार देंगे मैने कितनी बकरियों का जिबह किया होगा,पर मुझे बकरियों की जात सेनफरत नहीं हैलेकिन पुलिसवालों ने बंद समर्थक को जिस वहशियाने अन्दाज मे मारा मुझे लगा असली कसाई मैं नहीं उनकी जमात है'

आप जैसा लिखते हैं वैसा जीते हैं ,क्या एक रचानाकार के लिये यह जरूरी होता है

रचनाकर्म में रचनायें प्रधान पहलू हैं,उसका व्यक्तिगत जीवन गौण हम रचनाओं से वाकिफ़ हैं और पीढियां भी उसी से वास्ता रखेंगी


आपकी कविताओं से सरकार परेशान हो जाती है, क्या इसलिये कि आप माओवादी कवि हैं?

मैं माओवादी नहीं हूं, रचनाकार हूं बेशक आप मुझे नक्सली कवि कह सकतें हैं

साल भर पहले बनी पीडीएफ़आई {पीपुल्स डेमोक्रेटिक फेडेरेशन ऑफ इंडिया} का क्या
लक्ष्य था

लोकतांत्रिक हकों को बहाल करने और नये जनवादी अधिकारों को हासिल करने का पीडीएफ़आई एक खुला मोर्चा है सामंती उत्पीडन एव साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ़ हमारी एकता ऐतिहासिक है जो 'मुंबई प्रतिरोध मंच' के दो सालों के गंभीर प्रयासों की देन है १७५ संगठनों का यह मोर्चा हमेशा कायम रहेगा या नहीं यह बाद की बात है परंतु आज दरकार इसकी है कि हम सत्ता दमन के खिलाफ़ एक व्यापक एकजुटता कायम करें पीडीएफ़आई आम जनों के शोषण, देशी-विदेशी कंपनियों की लूट, जल-जंगल- ज़मीन पर हक और अर्जित की गयी पूंजी देश में रहे, ऐसे तमाम मौलिक मांगों पर एक आम सहमति रखता है जहां तक इसके भविष्य का प्रश्न है तो यह कहा जा सकता है कि संघर्ष के एक मुकाम के बाद 'वर्ग संघर्ष' के सवाल पर मतभेद उभर सकते हैं

पीडीएफ़आई में आप जैसे संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी का औचित्य ?

समानांतर जनसंस्कृति का एक नाम 'विरसम' है विप्लवी रचयिता संग्रामी मंच जनता की संघर्षशील चेतना को उन्नत कर रहा हैइसलिये यह जरूरी नहीं कि हम जहां जायें वे कम्यूनिष्ट ही हों जैसे चिली में १९७३ में एलएनडी के नेतृत्व में संघर्ष हुआ लेकिन वह शुरुआती राजनितिक जीवन में कम्युनिस्ट नहीं था फिर भी उसके रचे गीतों ने जनता की विद्रोही चेतना को सघर्षों से एकरूप किया विशाल गोखले को ही देखें तो उन्होने जो विद्रोही गीत गाये, उन गीतों का गोखले की रजनितिक समझ से कोई तालमेल ही नहीं है इसलिये संस्कृतिकर्मी किसी पार्टी का नहीं बल्कि संघर्षशील सर्वहारा का हरावल होता हैविश्व के कई देशों में इस तरह के उदाहरण देखे जा सकते है

लेकिन सरकार ने 'विरसम' पर यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया कि यह नक्सलवादियों का एक मंच है?

सरकार का रवैया फासीवादी है हम नक्सलवादी फ़्रंट नहीं है,परंतु नक्सलबाडी की विरासत को आगे बढाने वाले ज़रूर है

साम्राज्यवाद विरोधी सघर्षों में मुसलमान जनता की भागीदारी न के बराबर है?

'मुंबई प्रतिरोध मंच'२००४ के आयोजन में कम्युनिस्टों के बाद सबसे बडी भागीदारी साम्राज्यवाद विरोधी मुस्लिम सगठनों की थी पीडीएफ़आई मे उनकी भागीदारी नहीं हो सकी हैबेशक यह हमारी कमी है


क्या वजह रही कि 'मुंबई प्रतिरोध मंच' में जहां ३५० संगठन थे वह संख्या पीडीएफ़आई में घटकर १७५ हो गयी है?

यह लोकसंघ्रर्ष का एक मोर्चा हैपीडीएफ़आई जितने संगठनों को फिलहाल अपने साथ ला सकता था उनका उसने साथ लियाभारत जैसे बडे देश मे हज़ारों संगठन छोटे स्तर पर ही सही मगर सम्राज्यवाद-सामंतवाद के खिलाफ़ मुहिम चला रहे है इसलिये सारे संगठनों से पीडीएफ़आई का संपर्क अभी भी होना बाकी है

राष्ट्रीयताओं के सघर्ष यानी 'अलगाववाद' को किस रूप में देखते हैं?

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे राष्ट्रीयताओं के संघर्षों का क्रांतिकारी समर्थन करते हैं राष्ट्रीयताओं की मांगों को सरकार को फौरी तौर पर मान लेना चाहिये इतिहास का उदाहरण रूस से लिया जा सकता है जहां लेनिन ने छोटे-छोटे राज्यों को राष्ट्रीयता का दर्जा दे दिया था आगे चलकर हुआ यह कि वे सभी देश फिर रूस में शामिल हो गये और सोवियत संघ का निर्माण हुआ मगर वे अपनी स्वेच्छा से शामिल हुए हैं

आंध्र प्रदेश सरकार से नक्सलवादियों की बातचीत में आप वार्ताकार थे, उसका कोई हल नहीं निकला?

हल निकलता भी कैसे? एक तरफ़ सरकार हमसे शांति वार्ता कर रही थी और दूसरी तरफ़ सरकार इनकाउंटर कर रही थी हम कांबिंग बंद करने तथा फ़र्जी इनकाउंटर पर केस दर्ज करने की मांग कर रहे थे और पुलिस बल अपनी कार्रवाइयां ज़ारी रखे हुए था मेरा स्पष्ट मानना है कि नक्सली नेताओं का फर्जी इनकाउंटर पुलिसिया कार्रवाई मात्र नहीं है बल्कि राज्य प्रयोजित अभियान है १९९० में कांग्रेस मुख्यमंत्री चन्द्रा रेड्डी के कार्यकाल में जनवरी से सितम्बर तक आंध्र प्रदेश में एक भी इनकाउंटर नहीं हुआ ऐसा पुलिस के चलते नहीं राज्य सरकार के चलते हुआ था

प्रमुख मांगें क्या थीं?

जितने भी इनकाउंटर हुए हैं उसमें पुलिस वालों के खिलाफ़ ३०२ और ३०७ द्क मुकदमा दायर किया जाये साथ ही पुलिस बल यह साबित करे कि उसने जो कत्ल किये हैं वह आत्मरक्षा में हुए हैं इस मांग को सरकार ने सिरे से नकार दिया हमारी दूसरी मांग भूमि सुधार की थी आंध्र प्रदेश में लगभग ३५ प्रतिशत ज़मीन सरकार की है पूरी योजना के साथ हमने सरकार को बताया की आंध्र की भूमिहीन जनता को तीन-तीन एकड ज़मीन दी जाये

तो फिर आपकी गिरफ्तारी क्यों हुई?

वही पुराना बहाना कि मैं नक्सलियों का वर्ताकार था वारंगल में चल रहे 'विरसम' की दो दिनी कांफ़्रेंस पर भी हमला हुआ और १७ अगस्त को विरसम पर प्रतिबंध लगा १९ अगस्त को मुझे गिरफ्तार कर लिया गया।